Sunday, 7 May 2017

शौक था!

शौक था
कभी साथ चलने का
दूर दूर तक नीरव आसमान
को तकते जाना
सड़कों का पाँवों के नीचे से फिसलते जाना
सिर्फ़ सड़कें ही क्यों
एक उम्र,एक एहसास,एक जज़्बात
सभी कुछ तो फिसल रहा था
हम नहीं थे अलहदा इन चीजों से
फिर भी एक गुमान पाल रखा था साथ चलने का
हम परेशान हाल,तुम हौसला थी
इस सफ़र में
हम जिम्मेदार और तुम बेपरवाह थी इस सफ़र में
हम चुप चुप तुम बातूनी थी
इस सफ़र में
हम नीरस तुम सेंस ऑफ ह्यूमर से भरी थी
इस सफ़र में
शौक था
जब कभी साथ चलने का
अब कहाँ सब कुछ अपने हाथ में होता है
न उम्र,न एहसास, न लम्हात
तुम चली गई एकदम से, पर
सबकुछ ख़त्म थोड़े होता है एक झटके में
यकीन से नहीं पर कह सकता हूँ तुम कुछ बदली बदली हो
शौक था
कभी साथ चलने का
सो हम नहीं बदले
ईयर फोन का एक सिरा ही कान में लगाता हूँ
दूर-दूर नीरव आकाश को निहारता हूँ
सड़कें आज भी पाँवों के नीचे से फिसली जा रहीं हैं, पर
शौक था
कभी साथ चलने का
तो
आज भी मैं जब सफ़र में होता हूँ
तुम्हारे साथ होता हूँ ।


यकीं नहीं होता

सुनो तुम आई! और चली भी गई
यकीं नहीं होता
कभी मेरे जगते ही वापस सुला देती थी तुम
और आज
सो रहा था इसलिए जगाया नहीं और वापस चली गई
यकीं नहीं होता