आओ सुनाते हैं वो पीड़ा जो सुनने और सुनाने वाले दोनों पर एहसान होगा । भई लगती है । आपको नहीं लगती किसी की बात । साब ऐसा कैसे हो सकता है, हाँ मानता हूं आप देर तक बर्दास्त कर लेते हो , पर साब लगती तो है । मित्र हैं जो उन्हें अमित्र कहूँ बुरा भी मान जाएंगे और मित्र धर्म का पालन भी न होगा । पर कह ही डालता हूँ आप अब प्यार से मजबूर जो किये जा रहे हैं कहने को । शौकिया कहिये या नैतिक ज्वार-भाटा का आलोड़न विलोड़न , हमने भी 'भगीरथ प्रयास' नाम से एक ग्रुप बना दिया और उद्देश्य निर्धारित हुआ बहुत मामूली सा कि इस समूह का उद्देश्य प्रश्न उत्तर या तथ्य के रूप में हिंदी का ज्ञान एक दूसरे तक पहुँचाना या आदान प्रदान कह लीजिए । अब समस्या यहीं से शुरू हुई एक बार में हमने उन 40 मित्रों को समूह से जोड़ दिया जो हम पर करम फरमाते थे । अब कुछ स्वागत भी किया । यूँ गाड़ी चल निकली । थोड़ा अनुशासन मेन्टेन हुआ कुछ नियम बने । अब समस्या ये हुई कि 20 दिन तक भी कुछ मित्रों ने सांस न ली । हमने सक्रिय सदस्यों के सुझाव पर उन्हें बाहर कर दिया । ये पहला निर्णय था जब हमने उन करीबियों जोर का झटका धीरे से दिया जो ख़ुद को हमारे प्यार का अधिकारी मान बैठे थे । झटका लगा तो कुछ की नींद टूटी, अब भई झटके से नींद टूटेगी तो समस्या तो उतपन्न होगी । हुई। लोगों ने ऐसी तोहमतें लगानी शुरू की कि जबाव क्या देता । हमने उत्तर में लिखा काश!आप एडमिन होते और में तोहमतें लगा पाता ।