Wednesday, 28 June 2017

तथाकथित प्रगतिशील

बाबू मोशाय
तुम वामपंथी प्रगतिशील हो भारत के?
पर तथाकथित!
तुम हँसते हो जब तुम्हारा, वैचारिक विरोधी
पीटा जाता है।
तुम रोते हो जब तुम से, वैचारिक सहमति रखने वाला
पीटा जाता है।
तुम गाते हो ऐसा कोरस, जिसमें जनसमूह
आवाज़ नहीं दे पाता है।
तुम कहते हो, तुम खाते हो ऐसे वक़्त में जब पड़ोसी के
खाने पर पाबंदी हो।

हम तुम जैसे
तथाकथित प्रगतिशील नहीं
लेकिन!
हम मुस्कराते हैं जब मानवता चिरंजीवी होती है।
हम रोते हैं जब किसी का दिवाला, किसी के घर का ताला और किसी के मुँह का निवाला छिन जाता है।
हम गाते हैं, जब जनसमूह गाता है।
हम खाते हैं जब इफ़्तार और पारन दोनों पर ही ग्रहण न लगा हो।

तुम मुस्करा लो हमारी नादान वैचारिकी पर
हम उदास हों लें तुम्हारी ख़ुश फ़हमी पर!
कि!!
जब तुम हँसने, रोने, गाने और खाने के लिए भी वैचारिक कुनबे बना लो
तो तुम्हें तथाकथित न कहूँ
तो क्या कहूँ??