आधुनिक:- आधुनिक
का शब्दकोशीय अर्थ है- आजकल का, वर्तमान काल का, नये जमाने का। अंग्रेजी में इसके
लिए मॉडर्न (modern) शब्द का इस्तेमाल होता है। आधुनिक होने से तात्पर्य अतीत से स्व-प्रेरित पृथकता और नवीन
भावों के अन्वेषण की प्रक्रिया है । यूरोप में 16 वीं के मध्य से लेकर 19 वीं सदी
के मध्य तक आधुनिक शब्द का प्रयोग ‘वर्तमान’ के पर्याय के रूप में किया जाता था।
पुनर्जागरण आने के बाद आधुनिक या आधुनिकता का इस काह दौर में जो महत्वपूर्ण लक्षण बताये
गये हैं उनमें- यथार्थ की जटिलता, दुविधा, उलझन, अनिश्चितता, अनेकार्थता या जीवन
अर्थ का धुंधलापन। 19वीं शताब्दी के अंत तक आधुनिक होने का अर्थ सुधार,
कार्यक्षमता, प्रगतिशीलता आदि के व्यापक अर्थों में लगाया जाने लगा।
आधुनिकता:- आधुनिकता के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानो ने भिन्न भिन्न मत
दिए हैं। मूलतः आधुनिकता का अर्थ भी वर्तमान से ही लगाया जाता है। यदि हम आधुनिक
शब्द को चिंतन पूर्ण बौद्धिक प्रक्रिया कहें तो आधुनिकता को चेतना स्वरूप
प्रक्रिया कहना होगा जिसमें निरंतरता एक अनिवार्य तत्व है। आधुनिकता का स्वरुप
शाश्वतरूप से परिवर्तनशील है। आधुनिकता कभी भी अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती।
आधुनिकता किसी सामयिक तथ्य का नाम नहीं है। वस्तुतः हम कह सकते हैं कि-आधुनिकता एक
तरह की रचनात्मक स्थिति है जिसका अपना दर्शन है और जिसकी अपनी निजी वैचारिकता है।
डॉ. इन्द्रनाथ मदान के अनुसार “आधुनिकता प्रश्नचिह्न की निरंतरता है”। डॉ.
नरेन्द्र मोहन का मानना है की ‘आधुनिकता एक प्रश्नाकुल मानसिकता है जो हर
बंधी-बंधाई व्यवस्था या धारणा को तोडती है। धनंजय वर्मा ने कहा कि “आधुनिकता एक
धारणा वृत्ति नहीं है”। स्पष्ट है कि आधुनिकता कालसापेक्ष होते हुए भी कालजयी है।
आधुनिकतावाद:- आधुनिकतावाद का युग यूरोप में उन्नीसवीं सदी से शुरू होकर
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक माना जाता है। साहित्य में आधुनिकतावाद को बीसवीं सदी
के पूर्वार्द्ध से ही मन जाता है हालांकि अधिकाँश साहित्यकार यह भी मानते हैं कि आधुनिकतावाद
कोई अलग से साहित्यिक प्रवृत्ति, आन्दोलन, या सिद्धांत नहीं है, अपितु स्वछंदतावाद
का ही विस्तार है। टी.एस.एलियट की काव्य कृति ‘द वेस्टलैंड’और जेम्स ज्वायस का
उपन्यास यूलिसेस सं 1922 में प्रकाशित होने के साथ साहित्य में आधुनिकतावाद की
शुरुआत को मान लिया जाता है। आधुनिकतावाद सामजिक समस्याओं के बजाय व्यक्ति के
स्वरूप तथा आत्म-बोध को प्रमुख मानता है। आधुनिकतावाद धर्म, प्रकृति, परम्परा,
नैतिकता, प्रतिबद्धता, आस्था, मूल्य, तथा प्रत्येक प्रचलित विचार तथा
वास्तु-स्थिति और व्यवस्था को चुनौती देता है। विद्रोह उसका मूल स्वर है।
आधुनिकतावाद हर प्रकार के सामाजिक, नैतिक, वैचारिक, तथा यौन दमन के विरुद्ध है।
आधुनिकीकरण:- आधुनिकीकरण वह प्रवृत्ति है जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति
आधुनिकता की खोज में सनकी-सा हो जाता है। आधुनिकीकरण का सामान्यतया शाब्दिक अर्थ
नवीनीकरण से लिया जाता है। सामाजिक ढांचे में, पारिवारिक स्वरुप में, सामजिक
बन्धनों में, सभ्यता में रहन-सहन में, राजनैतिक रूप में बहुत ही तीव्र गति से
नवीनीकरण हो रहा है। आधुनिककरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे मनुष्य अपने पारम्परिक
जीवन पद्धति से मुक्त होकर अधिक संकुल, यांत्रिक, और तेज गति से चलने वाली
पद्दतियों की तरफ जाता है। सारांशतः कहा जा सकता है कि “आधुनिकीकरण बहिर्गत
अवस्थावों(ऑब्जेक्टिव कंडीशन), तथा आधुनिकता अन्तर्मुखी संकल्पों(सब्जेक्टिव
कंडीशन) की अभिभावक है।
आधुनिक
बोध:-
हिंदी में आधुनिकताबोध पर विभिन्न विचारवन्तों विभिन्न तरीके से
विचार-विमर्श किया है। किन्तु किसी सर्वमान्य सूत्र की तलाश कर पाने में असफल रहे।
आधुनिकताबोध को स्पष्ट करने के लिए बोध शब्द को स्पष्ट करना आवश्यक है। बोध का
शाब्दिक अर्थ ज्ञान, जानकारी, सांत्वना, धैर्य और तसल्ली से लगाया जाता है।
‘आधुनिकता का सामान्य अर्थ कालवाचक है इस अर्थ में आधुनिकबोध का अर्थ होगा
वर्तमानबोध’। इस तरह परम्परा से प्राप्त प्राचीन और मध्यकालीन बोध भिन्न नवीन-बोध
का वाचक है- आधुनिकताबोध, मध्यकालीन संस्कारों को त्याग कर नये तरीके से अपने और
आस-पास के परिवेश को समझना, लीक से हटना आधुनिकताबोध है।
उत्तर
आधुनिकता:- उत्तर आधुनिकता की पहली परिकल्पना
आर्नल्ड टॉयनबी ने की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक A Study Of History में
आज से लगभग 120 साल पूर्व 1850 इ.स. से 1857 इ.स. के बीच आधुनिक युग की समाप्ति की
घोषणा की थी। उन्होंने 1918-1939 के बीच के समय के लिए उत्तर आधुनिक शब्द का
प्रयोग किया था। उनके मतानुसार उत्तर आधुनिकता के मसीहा नीत्से थे। लेकिन उत्तर
आधुनिक शब्द का चलन बाद में आया... एडोर्नो-होर्खिमार ने इसे नये दार्शिनक अर्थ
दिये। बाद में फ्रांसीसी दार्शनिक ल्योतार ने इसे एक स्थिति के रूप में स्थिर करने
का प्रयत्न किया। उत्तर आधुनिक शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1979 में ल्योतार ने किया
था। उत्तर आधुनिकता विचार या दर्शन से अधिक एक प्रवृत्ति का नाम है। यह बीसवीं
शताब्दी की मूल धारा है। यह आधुनिक
पाश्चात्य मानवतावाद की अग्रचेतना की एक स्थिति है। ल्योतार, रोर्टी,
फूको एवम् देरिदा आदि के दर्शन मुख्य
रूप से हेगल के प्रत्ययवादी (Idealist)
विचारों की चेतन प्रतिक्रिया के रूप
में विकसित हुए हैं। उत्तर आधुनिकता की मूल चेतना आधुनिक ही है। क्योंकि इसका
विकास एवम् इसकी अस्मिता का आधार वही उद्योग हैं जो आधुनिकता की देन है। टॉयनबी के
अनुसार आधुनिकता के बाद उत्तर आधुनिकता तब शुरू होती है जब लोग कई अर्थों में अपने
जीवन, विचार एवम् भावनाओं में तार्किकता एवम् संगति को त्याग कर
अतार्किकता एवम् असंगतियों को अपना लेते हैं। इसकी चेतना विगत को एवम् विगत के
प्रतिमानों को भुला देने के सक्रिय उत्साह में दीख पड़ती है। इस प्रकार
उत्तर
आधुनिकतावाद:- उत्तर-आधुनिकतावाद (पोस्ट-मॉडर्निज़्म) एक व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन
‘कल्चरल मूवमेंट’ का नाम है, जो अनेक पूर्व-मान्यताओं और सिद्धांतों के प्रति
संदेहात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। जो पूर्व मान्यताएं आधुनिकतावाद का सत्व निर्मित
करती रहीं हैं और मानती रहीं हैं मानवीय प्रयासों के सभी क्षेत्रों में प्रगति
अपरिहार्य है, वे मान्यताएं हैं- (1) हर क्षेत्र में मानवीय प्रगति का प्रयास (2)
तर्क की शक्ति में आस्था (3) विचार एवं कलात्मक अभिव्यक्ति की मौलिकता में निष्ठा।
इन तीन अवधारणाओं के प्रति उत्तर-आधुनिकतावाद संदेह और अस्वीकार का मार्ग अपनाता
है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की समाप्ति के बाद की स्थिति है। रिचर्ड रोर्ती के शब्दों में उत्तर-आधुनिकतावाद ''विडम्बनात्मक सैद्धांतिकी'' है, जो हर शाश्वत सत्य और अनिवार्यताओं की खोज के विरूद्ध है। उत्तर-आधुनिकतावाद
को वृध्द पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है। पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में
तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। उत्तर-आधुनिक विमर्श की
शुरूआत संस्कृति के क्षेत्र से हुई।यही वजह है कि इसकी शैतानियों का जन्म भी यहीं
हुआ। आज भी विवाद का क्षेत्र यही है। प्रश्न उठता है कि संस्कृति के क्षेत्र में
ही यह उत्पात शुरू क्यों हुआ ?असल
में संस्कृति का क्षेत्र आम जीवन की हलचलों का क्षेत्र है और साम्राज्यवादी
विस्तार की अनन्त संभावनाओं से भरा है। पूंजी; मुनाफा; और
प्रभुत्व के विस्तार की लड़ाईयां इसी क्षेत्र में लडी जा रही हैं। जो किसी भी एक
व्याख्या या निष्कर्ष की योजना को चुनौती है। इसका आशय यह है कि इसमें अराजकता की
दिशा में चले जाने का खतरा भी है। उत्तर-आधुनिक इसे रेडीकल तत्व कहते हैं। यह सच
है कि उत्तर-आधुनिकतावाद ने महावृत्तान्त को समाप्त कर दिया है। प्रश्न यह है कि
ऐसा क्यों होता है? अधिकतर उत्तर-आधुनिकतावादी इसका उत्तर खोजने में असफल रहे हैं।
उत्तर आधुनिकता वस्तुत:पूंजीवादी फिनोमिना है। यह पूंजीवाद विरोधी फिनोमिना नहीं
है।
स्वच्छंदतावाद:- स्वच्छन्दतावाद
कला, साहित्य तथा बौद्धिक क्षेत्र का एक आन्दोलन था, जो यूरोप में अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में आरम्भ हुआ। 1800 से 1950
तक के काल में यह आन्दोलन अपने
चरमोत्कर्ष पर था। इस क्रांति के बौद्धिक नायक ज्याँ-ज़ाक रूसो को स्वच्छंदतावादी
चिंतन की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है। रूसो ने अपने ज़माने की सभ्यतामूलक
उपलब्धियों पर आरोप लगाया था कि उनकी वज़ह से मानवता भ्रष्ट हो रही है। 1761 में प्रकाशित रूसो की दीर्घ औपन्यासिक कृति ज़्यूली ऑर द न्यू
हेलोइस और अपने ही जीवन का अनूठा अन्वेषण करने वाली उनकी आत्मकथा कनफ़ेशंस इस महान
विचारक के स्वच्छंदतावादी नज़रिये का उदाहरण है। प्रेम संबंधों पर आधारित
भावनाप्रवण कहानी ज़्यूली ने युरोपीय साहित्य में स्वच्छंदतावाद के परवर्ती विकास
के लिए आधार का काम किया। अंग्रेज़ी भाषा में स्वच्छंदतावाद का साहित्यिक आंदोलन
विकसित हुआ जिसके प्रमुख हस्ताक्षरों के रूप में ब्लैक, वर्ड्सवर्थ, कोलरिज,
बायरन, शैली और कीट्स
के नाम उल्लेखनीय हैं। भारत में स्वच्छंदतावाद की पहली साहित्यिक अनुगूँज बांग्ला
में सुनायी पड़ी। आधुनिक हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद की पहली सुसंगत
अभिव्यक्ति छायावाद के रूप में मानी जाती है। हिंदी में स्वच्छंदतावाद का प्रभाव बीसवीं सदी के दूसरे दशक
में छायावादी कविता के रूप में सामने आया। हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली के
रचनाकार डॉ॰ अमरनाथ के अनुसार हिंदी में स्वच्छंदतावाद का ज़िक्र सबसे पहले
रामचंद्र शुक्ल के विख्यात ग्रंथ हिंदी साहित्य का इतिहास में मिलता है जहाँ
उन्होंने श्रीधर पाठक को स्वच्छंदतावाद का प्रवर्त्तक करार दिया है। अमरनाथ के
अनुसार छायावाद और स्वच्छंदतावाद में गहरा साम्य है। दोनों में प्रकृति-प्रेम, मानवीय दृष्टिकोण,
आत्माभिव्यंजना, रहस्यभावना,
वैयक्तिक प्रेमाभिव्यक्ति, प्राचीन संस्कृति के प्रति व्यामोह, प्रतीक-योजना, निराशा,
पलायन, अहं के
उदात्तीकरण आदि के दर्शन होते हैं।
छायावाद:- छायावाद विशेष
रूप से हिंदी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की वह काव्य-धारा है जो लगभग ई.स. 1918
से 1936 तक की प्रमुख युगवाणी रही। इसमें जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि मुख्य कवि
हुए। यह सामान्य रूप से भावोच्छवास प्रेरित स्वच्छन्द कल्पना-वैभव की वह स्वच्छन्द
प्रवृत्ति है, जो देश-कालगत वैशिष्ट्य के साथ संसार की सभी जातियों के विभिन्न
उत्थानशील युगों की आशा, आकांक्षा में निरंतर व्यक्त होती रही है। स्वच्छन्दता की इस
सामान्य भावधारा की विशेष अभिव्यक्ति का नाम हिंदी साहित्य में छायावाद पड़ा।
छायावाद नामकरण का श्रेय मुकुटधर
पाण्डेय को जाता है। इसके आधार पर हिंदी साहित्य में छायावादी युग और छायावादी आंदोलन को भी स्थान
मिला। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार-“चित्रभाषा या अभिव्यंजन पद्धति पर ही जब
लक्ष्य टिक गया तब उसके प्रदर्शन के लिए लौकिक या अलौकिक प्रेम का क्षेत्र ही बाकी
समझा गया। इस बँधे हुए क्षेत्र के भीतर चलनेवाले काव्य ने छायावाद नाम ग्रहण किया।”